तेरी गुड़िया, तेरी बेटी हुई हूँ। -बम्भू

तथाकथिक तेरी जाती, धर्म, समाज तेरी,
ये उंच-नीच, तीन-पाँच तेरी,
मैं मरी नहीं, मारी गयी हूँ, बात सुनो,
महज़ वो चार नहीं, कातिल समाज बात सुनो,
गाँव के प्रधान, और थाने के कोतवाल सुनो,
दयाल-दीन-गुरु-धर्म-के-समाज सुनो,
हुजूरे-राज्य और केंद्र की सरकार सुनो,
हिन्द में जी रहे, सारे पत्रकार सुनो।

…..bambhu

 

तेरी गुड़िया, तेरी बेटी

सब अपनी-अपनी कह कर चले गए
किसी ने पूछा भी नहीं मेरे बारे में
कोई रुका भी नहीं मेरे घर पर
कोई देखा भी नहीं मेरे कमरे को. 

मेरे घर के बगल में एक छोटा सा बगीचा है.
काश कोई जाता उस बगीचे तक,
उस आम के पेड़ के नीचे तक,
जिसके नीचे झाइयां है,
झाड़ियों में कुछ कांटे भी है, कुछ घास भी है,
और एक गड्ढा भी है जो कल तक नहीं था।

हाँ वही गड्ढा जिसमें दफन है,
मेरे कुछ सामान,
उसमे मेरी एक चप्पल भी है,
जो अब टूट गयी है, मुझे पसंद थी।

कोई पूछता की कैसे टूटी मेरी चप्पल,
मैं ने तो नहीं तोड़ी ये तय है,
क्योंकि मुझे बहुत पसंद थी मेरी चप्पल।
और मेरे पिता ने तो नहीं नोची होगी जिस्म मेरी,
क्योंकि उस वक्त अगर वो होते तो
आज मैं जिंदा होती, या वो भी मरे होते।
मेरी माँ ने तो नहीं तोड़ी होगी हड्डियाँ मेरी,
मेरे भाई ने तो नहीं फाड़े होंगे कपड़े मेरे।

मुझे कहते हैं जो बहादुर लड़की,
उन्हे मालूम क्या कितनी लाचार थी मैं,
चीख भी नहीं पायी जी भर के,
खाक इज्जत की बात करोगे तुम,
भीख जाँ की भी ना मिली मुझ को।

तथाकथिक तेरी जाती, धर्म, समाज तेरी,
ये उंच-नीच, तीन-पाँच तेरी,
मैं मरी नहीं, मारी गयी हूँ, बात सुनो,
महज़ वो चार नहीं, कातिल समाज बात सुनो,
गाँव के प्रधान, और थाने के कोतवाल सुनो,
दयाल-दीन-गुरु-धर्म-के-समाज सुनो,
हुजूरे-राज्य और केंद्र की सरकार सुनो,
हिन्द में जी रहे, सारे पत्रकार सुनो।

नहीं, मैं ख़ाक में मिली नहीं हूँ,
मैं तेरी गोद की परी हुई हूँ,
तेरे आँगन, जो खेलती-हँसती,
तेरी गुड़िया, तेरी बेटी हुई हूँ,
अगर तू आज भी चेता नहीं तो,
उसी झाड़ी में मैं लेटी हुई हूँ।
-बम्भू

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