आरक्षण – एक मत की जरुरत!

“आरक्षण– समाज में जातीय वर्ग में उत्पन्न असमानता व भेद-भाव को दूर करने के लिए, जो सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए है, उनको समाज के मुख्य धारा में लाने के लिए प्रावधान है।  आरक्षण अवसर है पिछड़े वर्ग को समान प्रतिनिधित्व करने के लिए, जिससे सरकारी सेवाओं और संस्थानों में प्रतिनिधित्व समानुपात हो। अन्य शब्दों में आरक्षण का मूल अर्थ प्रतिनिधित्व है, तथा आर्थिक मानदंडों के आधार पर आरक्षण नहीं है।”

प्रस्तावना

हम, भारत के लोग,
भारत के गठन के लिए पूरी तरह से संकल्प लिया गया है
संप्रभुता समाजवादी
धर्म निरपेक्षता जनतांत्रिकता में
अपने सभी नागरिकों को रक्षित और सुरक्षित करने के लिए:
न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक;
विचार, अभिव्यक्ति, मत, विश्वास और पूजा की जीवंतता;
स्थिति और अवसर की पूर्णता;
और उन सभी को बढ़ावा देने के लिए
व्यक्ति की गरिमा का आश्वासन देते हुए और
राष्ट्र की एकता और अखंडता;
हमारी सहमति के 26 नवंबर 1949 को इस अवधारणा को अपनाने, अधिनियमित करने और इसका लाभ उठाने के लिए

आरक्षण एक मत की जरूरत : मुकेश राम
आरक्षण एक मत की जरूरत : मुकेश राम

आरक्षण की शुरुआत

भारतीय परिप्रेक्ष में अस्पृश्यता की अवधारणा को भली-भाती समझा जा सकता है, जो की अगड़े जाती द्वारा पिछड़े जाती के साथ हुआ। इसमें शोषण चरम सिमा पर थी, यह शोषण सामाजिक वर्गीकरण के रूप के सदियों से परंपरागत तौर तरीके से चली आ रही थी। जाति व्यवस्था में निचली जातियों के लिए घोर उत्पीड़न, अलगाव और शिक्षा समेत समाजिक और आर्थिक शैली में आजादी न्यूनतम थी।  जिससे पिछड़े जातियों के दामन में विकाश की किरण नगण्य रही। 

हमारे समाज में समाज सुधारकों का अमूल्य योगदान रहा, जिनके  प्रयासों ने परम्परागत रूप से बनाई हुई  जात -पात की दिवार पर प्रहार हुआ।

समाज सुधारक ज्योतिराव फुले व साहू महाराज

महात्मा ज्योतिराव फुले भारतीय समाज में प्रचलित जाति पर आधारित विभाजन और भेदभाव के विरुद्ध थे। इन्होने ब्रिटिश शासनकाल में लॉर्ड रिपन के द्वारा 1882 ई हन्टर शिक्षा आयोग लागु पर नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के साथ सरकारी नौकरियों में सभी के लिए आनुपातिक आरक्षण प्रतिनिधित्व की मांग की।

अन्य समाज सुधारक शाहू महाराज द्वारा 1901- महाराष्ट्र के सामंती रियासत कोल्हापुर शाहू महाराज की ओर से वंचित समुदाय के लिए नौकरियों में 50 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था किया। यह आरक्षण को लेकर यह पहला राजकीय आदेश था,  इसके बाद 1908- अंग्रेजों द्वारा बहुत सारी जातियों और समुदायों के लिए प्रशासन में आरक्षण शुरू किया गया।

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर का योगदान

आप को भी ये किताब पढ्न चाहिए।  डॉ॰ बी.आर. अम्बेडकर जी के पुस्तक “What Congress and Gandhi Have Done to the Untouchables” दलितों के उत्थान के लिए वह इस बात को भली भाती समझते थे, की स्वतंत्रता मिलने के पश्चात दलितों का शोषण अति चरम अवस्था में होगा। डॉ॰ बी.आर. अम्बेडकर जी ने अछूत लोगों के लिए अलग से राजनीतिक प्रतिनिधि की मांग की।

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में हुए विचार विमर्श के फल स्वरूप कम्युनल अवार्ड की घोषणा की गई 16 अगस्त 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्मजे मैक्डोनल्ड ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व की माँग को मानते हुए दलित वर्ग को दो वोटों का अधिकार मिला। एक वोट से दलित अपना प्रतिनिधि चुनेंगे तथा दूसरी वोट से सामान्य वर्ग का प्रतिनिधि चुनेंगे। दलितों के लिए की गई पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था का गांधीजी ने विरोध किया। 

20 सितंबर 1932 को गांधी जी ने अनशन प्रारंभ कर दिया 26 सितंबर 1932 को राजेंद्र प्रसादमदन मोहन मालवीय के प्रयासों से गांधी जी और अंबेडकर के मध्य पूना समझौता हुआ, जिसमें संयुक्त हिंदू निर्वाचन व्यवस्था के अंतर्गत दलितों के लिए स्थान आरक्षित रखने पर सहमति बनी इस समझौते को पूना पैक्ट भी कहा जाता है।

Constitution of India. Image: Indian National Interest
Constitution of India. Image: Indian National Interest

संविधान के गठन के पश्चात आरक्षण

संविधान सभा के सदस्यों को संविधा लिखने में 2 वर्ष 11 माह 18 दिन समय लगा, यह विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है।   इसमें उनके द्वारा प्रत्येक वर्ग, धर्म जाती लिंग व क्षेत्र के आधार पर समानुपात रहे, पिछड़े वर्गो को समानुपात होने के लिए  चरण दर चरण अवसर दिए है।

संविधान की आत्मा अर्थात भारतीय संविधान की “उद्देशिका जिस में नागरिको को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक न्याय उपलब्ध कराने का संकल्प व्यक्त करता है”। भारतीय संविधान में समाजिक रूप से पिच्छड़े वर्ग अनुसूची जाती व अनुसूची जनजाती को समाज के मुख्य धारा में लाने के लिए 3 प्रकार के आरक्षण दिए गए है। 1.शैक्षिक आरक्षण जिसका विवरण अनुच्छेद 15 खंड 4 में, 2. नौकरी में आरक्षण अनुच्छेद 16 खंड 4 में तथा 3.राजनैतिक आरक्षण अनुच्छेद 330 ,331,332,333 में दिया गया है।

Preamble

WE, THE PEOPLE OF INDIA,
having solemnly resolved to constitute India
into a SOVEREIGN SOCIALIST SECULAR DEMOCRATIC
REPUBLIC and to secure to all its citizens:
JUSTICE, social, economic and political;
LIBERTY of thought, expression, belief, faith and worship;
EQUALITY of status and of opportunity;
and to promote among them all
FRATERNITY assuring the dignity of the individual and
the unity and integrity of the Nation;
IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this 26th day of
November, 1949, do HEREBY ADOPT, ENACT AND GIVE
TO OURSELVES THIS CONSTITUTION

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