एक विस्तृत्व व्यक्तित्व – भीमराव आंबेडकर

डॉ भीम राव आंबेडकर एक विस्तृत व्यक्तित्व है। वह एक महान भारतीय न्यायविद्, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक, जिन्होंने दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया, अछूतों के प्रति सामाजिक भेदभाव के खिलाफ अभियान चलाया। अंतः वह शिक्षा ग्रहण करते रहे, और समाज को शिक्षित, संगठित व विकसित मार्ग दिखाया।
निम्नलिखित अधिकांश वर्णन उनकी पुस्तक वेटिंग फॉर अ वीसा के आधार पर है।

परिवार का परिचय

भीमराव आम्बेडकर अपने माता पिता के 14वी संतान थे, उनका जन्म 14 अप्रैल 1891 में मध्य प्रदेश के इन्दौर जिले का एक छोटा सा कस्बा “महूँ” में हुआ था। वर्तमान में इस स्थान को डॉ॰ आम्बेडकर नगर भी कहा जाता है। उनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता भीमाबाई है। उनका परिवार मूलरूप से महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के अंबावाड़ी के थे, वे लोग कबीर पंथ के अनुयायी थे।

अंबेडकर के 3 भाई और 4 बहन थे, बड़े भाई का नाम आनंद राव उनसे छोटे बाला राव तथा सबसे छोटे भीम राव ,बहनो का नाम गंगा, रमा, मंजला, और सबसे छोटी तुलसी बाई था। अंबेडकर का विवाह 16 वर्ष की आयु में 1906 में रमा बाई से हुआ। उनके कुल 5 बच्चे हुए सबसे बड़े पुत्र का नाम यशवंत राव, उनसे छोटा गंगाधर, उनसे छोटा रमेश, चौथी पुत्री इंदु व सबसे छोटा पुत्र राज रतन है। 5 बच्चो में से 4 बच्चे बीमारी और आर्थिक तंगी के कारन मृत्यु हो गई केवल यशवंत राव जीवित रहे।

1894 में भीमराव अंबेडकर जी के पिता सेवानिवृत्त हो गए और इसके दो साल बाद अंबेडकर की मां की मृत्यु और आगे 1913 में पीता का भी देहांत हुआ।

शिक्षा और संघर्ष

भीमराव आंबेडकर का प्राथमिक शिक्षा  दापोली और सतारा में हुआ। इसके बाद बंबई के एलफिन्स्टोन स्कूल से 1907 में मैट्रिक की परीक्षा पास की, इस स्तर पर शिक्षा प्राप्त करने वाले दलित समाज के पहले व्यक्ति थे। मैट्रिक पास के अवसर पर एक दीक्षांत समारोह आयोजित हुआ, उसमें भेंट स्वरुप उनके शिक्षक श्री कृष्णाजी अर्जुन केलुस्कर ने स्वयं लिखित पुस्तक ‘बुद्ध चरित्र’ पुरस्कार स्वरूप दिया गया। बड़ौदा नरेश सयाजी राव यकवाड द्वारा  फेलोशिप से आगे की पढाई की। भीमराव ने 1912 में मुबई विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र व राजनीती विज्ञानं में डिग्री लेकर स्नातक परीक्षा पास की। संस्कृत पढने की सवतंत्रता नहीं  होने के कारण फारसी लेकर उत्तीर्ण हुये।

बड़ौदा राज्य द्वारा छात्रवृत्ति से कोलंबिया विश्वविद्यालय में पोस्टग्रेजुएशन करने के लिए 1913 में अमेरिका चले गए। जून 1915 में भीमराव अंबेडकर ने अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र, इतिहास व मानव विज्ञान के साथ अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की।

इसके बाद ‘प्राचीन भारत का वाणिज्य’ विषय पर रिसर्च की किया। और 1916 में दूसरा शोध कोलंबिया विश्वविद्यालय से ही किया उनके पीएच.डी. का विषय ‘ब्रिटिश भारत में प्रातीय वित्त का विकेन्द्रीकरण’ था। इसके बाद उन्होंने वहां लंदन स्कूल ऑफ इकोनामिक्स एण्ड पोलिटिकल सांइस से और  विज्ञान स्नातकोत्तर एम.एससी. 1921 में किया और आगे 1922 में उन्हें ग्रेज  इन द्वारा बैरिस्टर-एट-लॉ की डिग्री प्रदान की गई और  बैरिस्टर के रूप में ब्रिटिश बार में भर्ती करवाया ।

1923 में उन्होंने अर्थशास्त्र में  डी॰एससी॰  (डॉक्टर ऑफ साइंस) की डिग्री प्राप्त की। उनकी थीसिस “रुपये की समस्या: इसका मूल और इसका समाधान” थी लंदन में अपनी पढ़ाई पूरी करने और भारत लौटने के बाद, भीमराव अम्बेडकर तीन महीने जर्मनी में रहे, जहाँ उन्होंने बॉन विश्वविद्यालय में अपना अर्थशास्त्र का अध्ययन जारी रखा। लेकिन समय की कमी के कारण, वे विश्वविद्यालय में अधिक नहीं रह सके। उनके आखिरी डिग्री  (एलएलडी, कोलंबिया विश्वविद्यालय, 1952 और डी लिट उस्मानिया विश्वविद्यालय, 1953) से प्राप्त की।

इस प्रकार “बाबा साहेब” भीमराव  अम्बेडकर अपनी जिंदगी में पढाई को अपना सच्चा साथी बनाया।

अस्पृशयता और दुष्प्रभाव

1894 में पिता के सेवा निवृत्ति के बाद पूरा परिवार महाराष्ट्र के सातारा में स्थानांतरित हो गया, पिता के भारतीय आर्मी में कार्यरत होने से विशेष लाभ प्राप्त हुआ और स्कूल में दाखिला मिल गया। परन्तु अम्बेकर को बचपन से ही जातिगत भेद भाव का शिकार होना पड़ा। उनके सहपाठी भी बाल अवस्था में जातिगत उच्च-नीच और छुआ-छूत का  करते थे। दलितों को कक्षा में बैठने की अनुमति नहीं थी, उन्हें कक्षा के एक कोने में खुद के द्वारा लाये कपडे पर बैठते थे, स्कूक में उन्हें पानी भी छूने की इजाजत नहीं थी, प्यास लगने पर चपरासी द्वारा ऊपर से पानी पिलाया जाता था।  फिर भी तमाम संघर्षों केबाद भी अच्छी शिक्षा प्राप्त की।

आंबेडकर अस्पृशयता के दुष्प्रभाव के कारण बहुत सी यातनाए झेलनी पड़ी, अछूत होने के कारण समाजिक सौहार्द प्राप्त नहीं हुआ । कोई धोभी उनके कपडे नहीं धोता था, कोई नाइ उनके बाल नहीं काटता था, जबकि उसका मूल्य चुकाने में समर्थ थे। उनके बाल हमेशा उनकी बहन ही कटती थी।

आंबेडकर और अस्पृशयता- पहला घटना जिसे कभी नहीं भुला सके

आंबेडकर के जिंदगी में अश्पृश्यता का वह पहला घटना था, जिसे नहीं बुला सके। उस समय भीमराव अंबेडकर 1991 में 9 वर्ष की अवस्था में थे। अपने भाइयो के साथ पिता से मिलने के लिए कोरेगांव जा रहे थे। उनके पिता कोरेगांव में सतारा जिले में खटाव तालुका स्थान एक कंपनी में खजांची के रूप में कार्यरत थे। उनके पिता कार्यस्थल नहीं छोड़ सकते थे।

भीमराव और उनके भाई उनसे मिलने के लिए कोरेगांव जाना पड़ा। जाने से पहले उन्होंने पत्र लिखकर पिता को सूचित किया की स्टेशन पर उन्हें लेने आए अथवा किसी को लेन के लिए भेजे।

बाबा साहेब और उनके भाई नए-नए लिवाज पहने हुए थे। अंग्रेजी लिवाज की तरह नया कोट, टोपी व धोती पहनकर रोमांच के साथ तैयार थे। ऐसा इसलिए था, क्योंकि वह पहली बार ट्रेन देखने वाले थे।

बाबा साहेब सतारा से ट्रेन पकड़ वह गंतव्य स्थान पहुंच गए। परंतु  स्टेशन पर लेने के लिए कोई भी नहीं आया। सभी बच्चे बेबस और लाचार होकर उदास बैठे थे। इस इंतज़ार में कि कब उनके पिता उन्हें लेने आएंगे।

बच्चो को बेबस और परेशान देख स्टेशन मास्टर उनके निकट आए। बाबा साहेब और उनके भाई देखने में ब्राह्मण पुत्र लग रहे थे। समीप आकर पूछा कौन हो ? यहां क्या कर रहे हो? उन्होंने जवाब दिया कि वह अपने पिता का इंतजार कर रहे हैं।

स्टेशन मास्टर ने जैसा कि हमेशा होता है, उनसे पूछा कि तुम लोग कौन हो? अंबेडकर ने उन्हें जवाब दिया, हम महार है। महार जाति नाम सुनते ही स्टेशन मास्टर पीछे हट अपने कक्ष में चला गया और बच्चे वैसे ही उदास बैठे रहे।

समय लगभग शाम 6:30 सभी घबराकर रोने लगे। स्टेशन मास्टर बहार आ कर पूछा उन्होंने पूछा कहां जाना है। अंबेडकर ने जवाब दिया कि हमें कोरेगांव जाना है। स्टेशन मास्टर ने टोंगा (एक प्रकार की घोड़ा गाड़ी) वालो से बात की।  टोंगा वाला अशुद्धता से बचने के लिए उन्हें अपनी गाड़ी में नहीं बैठाने वाला था।

बड़ी मशक्कत के बाद एक टोंगा वाले ने इस शर्त पर हामी भरी की दुगना किराया के साथ टोंगा स्वयं उन्हें चलाना होगा। असहाय परेशान बच्चो ने हा किया और टोंगा वाले के साथ चल दिया। मार्ग में भूख प्यास, बेबसी और बच्चो का अस्पृशयता के कारण भयभीत हुए। अगले दिन अपने पिता के पास पहुंचे। पिता आश्चर्यचकित होकर थे की बिना बताये क्यों आये।  बाद में पता चला की उनके नौकर ने वह पत्र छुपा दिया था।

दूसरा घटना -बड़ौदा में आवास खोजने में असमर्थ

आंबेडकर यूरोप और अमेरिका में पढाई के दौरान 5 साल बिताये। 5 साल के दौरान कभी अहसास नहीं हुआ। की वह एक अछूत है। वह अछूत जो भारत में जहां भी गया, स्वयं और दुसरो के लिए समस्या था।

स्कॉलर शिप ख़त्म होने पर भारत वापसी में गुजरात पहुंचे। वहाँ बड़ौदा के महाराजा द्वारा महालेखाकार कार्यालय में प्रोबेशनर के रूप में नियुक्त किया गया था। जैसे ही रेलवे स्टेशन के बहार आये तो उनके दिमाग में एक प्रश्न उत्पन्न हुआ की उन्हें कहाँ जाना है? कौन उन्हें लेने आएगा?

आंबेडकर ने गहराई से महसूस किया की हिन्दू होटल नहीं जा सकता। हिन्दू होटल जिसे विशिस कहा जाता है। उन्हें पता था की वे उन्हें नहीं रखेंगे उसमे रहने के लिए ब्राह्मण रूप में रहना पड़ता। लेकिन बाबा साहेब इसके लिए तैयार नहीं थे। वह जानते थे, की झूट पकड़े जाने पर क्या परिणाम होगा।  

बड़ौदा में उनका एक मित्र था जो अमेरिका में उनके साथ पढ़ने के लिए साथ गए थे। लेकिन वह इस बात पर गंभीर थे, की उनके परिवार किसी अछूत को स्वीकार करने में शर्मिंदा महसूस करेंगे।

आंबेडकर ने स्टेशन पर यात्रियों को ले जाने वाले गाडी चालक से परिसर में होटल के बारे में पूछा, उत्तर में गाडी चालक ने पारसी सराय बताया।  इस बात पर तसल्ली हुई की वहा रहा जा सकता है। पारसी, पारसी धर्म के अनुयायी होते है, वहा उनके अछूत होने का कोई डर नहीं था, क्योकि पारसी अस्पृश्यता को नहीं मानते है। आंबेडकर गाडी में समान रख गाडी चालक को वहा ले जाने को कहा।

सराय में एक कार्यवाहक था, जो वहाँ आने वाले पर्यटकों के लिए भोजन की आपूर्ति करता था। कार्यवाहक ने आंबेडकर को कमरा दिखाया, कमरा प्रथम ताल पर था। एक छोटा कमरा अलग से बाथरूम और साथ में बड़ा हॉल जहा ढेरो पुराने सामान जमा था।  यहाँ लम्बे समय से कोई रहने के लिए नहीं आया होगा।

यह सराय एक काल कोठरी जैसा था, परन्तु इसके अलावा उनके पास कोई मार्गनहीं था। इसी बिच केयरटेकर हाथ में रजिस्टर लेकर आया उसने पूछा की तुम कौन हो? क्योकि उनके पास सदरा और कस्तूरी नहीं थी, ये दो चीजें जो साबित करती हैं, कि एक पारसी है।

बाबा साहेब झूट नहीं बोल पाए और बताया की वह एक हिन्दू है। केयरटेकर ने रहने के लिए मना कर दिया। यह कहते हुए की यह सराय पारसियों द्वारा केवल पारसी के उपयोग के लिए बनाया है।

आंबेडकर ने उन्हें निवेदन किया की उन्हें रहने दिया जाये, केयरटेकर ने किराये का मूल्य बढ़ा कर रहने दिया। वहा आंबेडकर एक काल कोठरी में कैदी से भी बुरे हाल में रहने को मजबूर थे, वहा लाइट नहीं थी। कार्यवाहक उनके लिए एक दीपक ले के आये, जिसमे बहुत काम रौशनी थी।

आंबेडकर समय से कार्यालय जाते थे, और कोशिश करते थे की देर से वापिस पहुंचे बाबा साहेब लगातार कोशिश में थे किजल्द से जल्द ठिकाना मिल जाये। दफ्तर में आवेदन दिया हुआ था परन्तु इसमें विलंभ हो था। 

सराय में ठहरने के 11वे दिन सुबह 10-12 पारसी गुस्से से आग बबूला हुए हाथ में छड़ी लिए सरए में आये और पूछने लगे कौन हो तुम ? वह सभी सच जान चुके थे। वे सभी अभद्र गलियों देते हुए सराय खाली करने के लिए धमकी दे रहे थे। यह स्थान एक जेल से कम नहीं था, परन्तु अब तक यह आखिरी सहारा था। इस पर वह फुट फुट कर रोये।

तीसरा घटना- आंबेडकर और चालीसगॉव

सन 1929 में बॉम्बे सरकार ने अछूतो की शिकायतों की जांच के लिए एक समिति बनाई जिसमे आंबेडकर को भी नियुक्त किया गया। अन्याय, उत्पीड़न और अत्याचार के आरोपों की जांच के लिए समिति को पूरे प्रांत का दौरा करना पड़ा।

आंबेडकर और उनके साथ एक अन्य सदस्य को खानदेश के दो जिले दिए गए। अपना काम ख़त्म करने के बाद उनका साथी एक संत के दर्शन के लिए चले गए।आंबेडकर बॉम्बे लौटने के लिए ट्रेन पकड़े, परन्तु वह चालीसगॉव के धुलिया रेखा गॉव में जांच के लिए उतर गए। जहां हिन्दुओ ने अछूतो के खिलाफ घोषित किया था।

जाँच कार्य के बाद चालीसगाँव के अछूतों ने स्टेशन पर आकर उनसे उस रात को रुकने के लिए आग्रह किया। वह सहमत हुए और अगली ट्रेन से चालीसगॉव पहुंचे। स्टेशन पर चालीसगाँव के अन्य अछूत उनके स्वागत के लिए खड़े थे।

स्टेशन पर काफी इंज़ार के बाद उन्हें लेने के लिए टोंगा गाड़ी आई, गाडी में समान रखने के बाद स्वागत करता अन्य छोटे रस्ते से पैदल चल पड़े। गाड़ी चालक के तरीके से उन्हें यह अहसास हुआ की चालक नौसिखिया है। रस्ते में एक नदी पाड़ करनी नदी का पूल पहले से टूटी फूटी थी। नदी पाड़ करते समय दुर्घटना घटी और आंबेडकर निचे गिर गए, जिससे उन्हें काफी चोट आई।

कुछ लोगो द्वारा जो की उनका स्वागत करता थे,वह लोग उनसे पहले नदी पाड़ कर इंज़ार कर रहे थे। उन्हें उठाया और दवाई किया, बाद में पूछताछ के बाद पता चला की गांव वाले उन्हें पैदल लाने में शर्मिंदा होते।

बाबा साहेब को लाने कि लिए कोई टोंगा वाला तैयार नहीं था। इसलिए ग्रामीण वासियो ने टोंगा किराये पर लेकर गांव के एक व्यक्ति को चालक के लिए तैयार किया। आंबेडकर की गरिमा को बचाने के लिए, चालीसगाँव के महारों ने जो उपाय सोची उसमे वह भूल गए कि यात्री की सुरक्षा उसकी गरिमा के रखरखाव से अधिक महत्वपूर्ण थी।

चौथा घटना - दौलताबाद के किले में पानी का प्रदूषण

यह घटना 1934 की है, जब आंबेडकर राजनीती में उदास वर्गो (दलित) के एक मात्र नेता के रूप में उभर गए थे। उनकी पार्टी  के कुछ साथी उनके साथ उदास वर्गों के आंदोलन देखने की इच्छा व्यक्त किया। साथ ही यह निर्णय  लिया की वेरुल में बौद्ध गुफाओं की यात्रा किया जायेगा।

वेरुल जाने के लिए उन्हें औरंगाबाद हो कर जाना था। औरंगाबाद हैदराबाद के मुस्लिम राज्य का एक कस्बा है।औरंगाबाद के रास्ते में उन्हें सबसे पहले दौलताबाद नामक एक अन्य शहर से गुजरना था। दौलताबाद एक ऐतिहासिक स्थान है। एक समय में दौलताबाद रामदेव राय के नाम से प्रसिद्ध हिंदू राजा की राजधानी थी। दौलताबाद का किला एक प्राचीन ऐतिहासिक स्मारक है।

उन्होंने कुछ बसों और टूरिंग कारों को किराए पर लिया। आंबेडकर और उनके साथी लगभग तीस लोग थे। उन्होंने नासिक से येओला तक शुरुआत की, क्योंकि येओला औरंगाबाद के रास्ते पर था। आंबेडकर ने दौरे के कार्यक्रम की घोषणा जानबूझकर क्योकि राज्य के बाहरी हिस्सों में एक अछूत पर्यटक को जो कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, उससे बचने के लिए वे गुप्त यात्रा करना चाहते थे।

दौलताबाद में उनके पार्टी के लोगों को सूचना मिली थी कि वह आ रहे हैं। वे शहर के प्रवेश द्वार पर एकत्रित होकर प्रतीक्षा कर रहे थे, दौलताबाद पहुंचने पर चाय और जलपान करने के लिए प्रस्ताव रखा गया, परन्तु समय के आभाव के कारण सीधे दौलताबाद किले को देखने के लिए आगे चले। 

किला पहुंचने के बाद मुख्य द्वार पर पानी से भरा एक छोटा सा टैंक दिखा जो की चौड़े पत्थर के फुटपाथ के चारों ओर था । सभी यात्रियों के चेहरे, शरीर और कपड़े यात्रा के दौरान धूल से भरे हुए थे, और उन सभी को धोने की इच्छा थी। ज्यादा सोचे बिना, कुछ सदस्यों ने टैंक के पानी से अपने चेहरे और अपने पैर धोए और किले के मुख्य द्वार से प्रवेश किया।

किले के अंदर गार्ड से किले में जाने की अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया पूछ थे की पीछे से एक बुजुर्ग मुस्लिम व्यक्ति जोर चिल्लाते हुए “अछूतो ने टैंक को छू कर उसे दूषित किया है” समीप पंहुचा।

जल्द ही भीड़ इकठ्ठा हो गई, जिसमे केवल मुस्लिम युवा और बुजुर्ग लोग शामिल थे। भीड़ उनके साथ दुर्व्यवहार कर कहने लगे “अछूत अपना धर्म भूल गए हैं, अछूतो को सबक सिखाया जाना चाहिए” क्रोध और घृणा अत्यधिक उत्तेजित थी। अम्बेकर ने उन लोगो को बार बार समझने की कोशिश कि वे बाहरी लोग है और स्थानीय रिवाज नहीं जानते थे।

लेकिन मुस्लिम लोग उनके स्पष्टीकरण को सुनने के लिए तैयार नहीं थे। वे आंबेडकर और उनके साथियो को गालीया दे रहे थे। माहौल ऐसा हो रहा था, की आसानी से एक दंगा हो सकता जाता , संभवतः हत्याएं भी हो सकती थी।

हालांकि, आंबेडकर ने संयम बनाए रखा और कुछ गुस्से वाले स्वर में पूछा, “क्या तुम्हारा धर्म यही सिखाता है? क्या तुम एक अछूत को इस टैंक से पानी लेने से रोकोगे अगर वह मुस्लिम बन गया तो भी ?” इन सीधे सवालों का मुस्लिमो पर कुछ असर पड़ता दिखाई दिया, उन लोगो ने कोई जवाब नहीं दिया और चुप खड़े रहे।

आंबेडकर ने गार्ड की ओर मुड़कर फिर से गुस्से में स्वर में कहा, “क्या हम किले में जा सकते हैं या नहीं? हमें बताएं, यदि हम नहीं जा सकते, तो हम यहाँ रुकना नहीं  चाहते”। गार्ड ने उनका नाम पूछा। आंबेडकर ने एक कागज़ पर कर गार्ड को दिया। गार्ड उसे अधीक्षक के पास ले गया, और बाहर आकर बताया कि आप लोग किले में जा सकते हैं।

लेकिन बाबा साहेब या उनके साथियो को पानी छूने की इजाजत नहीं दी गई। एक सशस्त्र सैनिक को उनके साथ जाने का आदेश दिया।सैनिक को आदेश था की उन्हें पानी नहीं छूने दे। 

आंबेडकर ने एक उदाहरण दिया कि एक व्यक्ति जो एक हिंदू के लिए अछूत है, एक पारसी के लिए भी अछूत है। इससे पता चलता है कि जो व्यक्ति हिंदू के लिए अछूत है, वह मुस्लिम के लिए भी अछूत है।

पांचवा घटना -डॉक्टर द्वारा इलाज से इनकार के कारण महिला की मृत्यु

यह घटना भी समान रूप से मानवता को झकझोर देने वाली है। यह वृत्तांत काठियावाड़ गाँव के एक अछूत स्कूल शिक्षक का है। जिसे यंग इंडिया समाचार पत्रिका में महात्मा गाँधी के द्वारा 12 दिसंबर 1929 को उल्लेख किया गया था। इसमें एक शिक्षक की पत्नी जिसने एक बच्चे को जन्म दिया। रोगी  के अछूत होने के कारन डॉक्टर द्वारा उचित चिकित्सा दिया गया। उचित चिकित्सा के आभाव के कारण रोगी की मौत हो जाती है।

यह हादसा 5 दिसंबर 1929 को काठियावाड़ गाँव में हुआ। यहाँ एक स्कूल शिक्षक की पत्नी ने 7 दिसंबर 1929 नवजात शीशू को जन्म दिया। बच्चा जन्म देने के बाद महिला बीमार हो जाती है। उसे दस्त और शरीर में दर्द के कारण साँस लेने में तकलीफ हो रही थी।

शिक्षक डॉक्टर को बुलाने गया परन्तु डॉक्टर में एक हरिजन के घर जाने मना कर दिया। इलाज के लिए शिक्षक ने हाथ पैर जोड़े लेकिन डॉक्टर ने साफ मना कर दिया। शिक्षक कुछ साथियो के साथ नागरसेठ और गरासिया दरबार में सहायता के लिए विनती की। नागरसेठ ने 2 रुपए डॉक्टर की फ़ीस दी और चिकित्सा के लिए कहा। डॉक्टर ने इस शर्त पर स्वीकार किया की वह अछूत बस्ती के बहार ही इलाज करेगा।

शाम तक़रीबन 8 बजे शिक्षक अपनी पत्नी और नवजात बच्चे को बहार लाया। डॉक्टर ने अपना थर्मामीटर एक मुस्लिम व्यक्ति के माध्यम से शिक्षक को दिया। शिक्षक अपने हाथो से थर्मामीटर लगाकर बुखार माप कर वापिस मुस्लिम व्यक्ति को दिया। मुस्लिम व्यक्ति से थर्मामीटर लेकर डॉक्टर में बुखार का जाँच किया। 

डॉक्टर एक दीपक की रौशनी में थर्मामीटर को देख कर शिक्षक को बताया की रोगी निमोनिया से पीड़ित है। बुखार जाँच कर डॉक्टर वापिस चला गया और दवाई भेज दी। डॉक्टर ने इसके रोगी को बाद पुनः देखने से इनकार कर दिया। जबकि उसने दो रुपये फीस ले ली थी।शिक्षक बज़ार से कुछ अलसी लाया और रोगी पर इस्तेमाल किया। बीमारी खतरनाक थी जिस कारन अगले दिन 2 बजे के करीब रोगी का देहांत हो गया।

डॉक्टर, शिक्षित होने के बावजूद, थर्मामीटर लगाने और एक बीमार महिला का गंभीर स्थिति में इलाज करने से इनकार कर दिया। उसके इलाज के लिए मना करने के परिणामस्वरूप, महिला की मृत्यु हो गई। उसके मन यह विचार नहीं आया की जिस पेशे से बंधा हुआ है उसके नियम कानून भी है।
हिन्दू किसी अछूत को छूने की बजाये अमानवीय होना पसंद करेंगे।

गली गलौच के बाद युवक का नौकरी छोड़ना

6 मार्च 1938 को कसरवाड़ी कपडे मिल के पीछे दादर- बम्बई में इंदु लाल यद्निक की अध्यक्षता में भंगी लोगो की बैठक हुई। इस बैठक में एक भंगी लड़के ने अपना अनुभव साझा किया। मैंने 1933 में मातृभाषा की अंतिम अपरीक्षा पास की मैंने चौथी कक्षा थक अंग्रेजी पढ़ी थी। मैंने शिक्षक के रूप में रोजगार के लिए बॉम्बे म्युनिसिपलिटी की स्कूलों की समिति में आवेदन किया था, लेकिन रिक्त नहीं होने के कारन मई असफल रहा।

फिर मैंने अहमदाबाद में पिछड़ा वर्ग अधिकारी पटवारी की नौकरी के लिए, आवेदन किया और मैं सफल हुआ। 19 फरवरी 1936 को मुझे खेड़ा जिले के बोरसद तालुका के ममलतदार के कार्यालय में तलाटी नियुक्त किया गया।
हालांकि मेरे परिवार मूल रूप से गुजरात से आया है, मैंने पहले गुजरात में कभी नहीं किया गया था। यह मेरा पहला वहाँ जाने के लिए अवसर था। इसी तरह, मुझे नहीं पता था कि सरकारी कार्यालयों में अस्पृश्यता देखी जाएगी। इसके अलावा अपने आवेदन में अपने एक हरिजन होने का उल्लेख किया गया और इसलिए मुझे उम्मीद था की मेरे सहकर्मियों को पता होगा की मई कौन हु , मुझे ममलातदार के कार्यालय के क्लर्क के रवैये को देखकर आश्चर्य हुआ जब मैंने खुद को तलाटी के पद का कार्यभार सौंपा

Karkun नफ़रत से पूछा, “तुम कौन हो?” मैंने जवाब दिया, “सर, मैं एक हरिजन हूँ।” उन्होंने कहा, “चले जाओ, थोड़ी दूर खड़े रहो। तुम मेरे पास खड़े होने की हिम्मत कैसे करोगे! तुम कार्यालय में हो, अगर तुम बाहर होते तो मैं तुम्हें छह किक दे देता। सेवा के लिए यहां आने के लिए क्या दुस्साहस है!” इसके बाद, उन्होंने मुझे अपने प्रमाण पत्र और एक तलाटी के रूप में नियुक्ति के आदेश को जमीन पर छोड़ने के लिए कहा। उसने फिर उन्हें उठाया। जब मैं बोरसाद में ममलतदार के कार्यालय में काम कर रहा था, तब मुझे पीने के लिए पानी मिलने के मामले में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा। कार्यालय के बरामदे में पीने के पानी से युक्त डिब्बे रखे हुए थे। इन वॉटर कैन के प्रभारी एक वॉटरमैन थे। उनका कर्तव्य था कि जब भी उन्हें आवश्यकता हो, कार्यालय में लिपिकों को पानी पिलाया जाए। वाटरमैन की अनुपस्थिति में वे स्वयं कैन से पानी निकाल सकते थे और उसे पी सकते थे
मेरे मामले में यह असंभव था। मैं डिब्बे को छू नहीं सकता था, क्योंकि मेरे स्पर्श से पानी प्रदूषित हो जाता था, इसलिए मुझे वाटरमैन की दया पर निर्भर रहना पड़ा। मेरे उपयोग के लिए एक छोटा सा जंग वाला बर्तन रखा गया था, कोई भी इसे नहीं छूता था और न ही इसे छोड़ता था। यह इस पॉट में था कि वॉटरमैन मेरे लिए पानी निकाल देगा। लेकिन मुझे पानी तभी मिल सकता था जब वाटरमैन मौजूद हो। इस वॉटरमैन को मुझे पानी की आपूर्ति करने का विचार पसंद नहीं आया। यह देखते हुए कि मैं पानी के लिए आ रहा हूं, वह दूर खिसकने का प्रबंधन करेगा, जिसके परिणामस्वरूप मुझे पानी के बिना जाना था; और जिन दिनों मेरे पास पीने के लिए पानी नहीं था, वे किसी भी तरह से कम नहीं थे।

मुझे अपने निवास के संबंध में वही कठिनाइयाँ हुईं। मैं बोरसद में अजनबी था। कोई भी जाति हिंदू मुझे किराए पर घर नहीं देती। हिंदुओं को विस्थापित करने के डर से, जो मेरे ऊपर एक क्लर्क, एक स्टेशन के रूप में रहने का मेरा प्रयास पसंद नहीं करते थे, बोरसैड के अछूत मुझे बंधक बनाने के लिए तैयार नहीं थे। भोजन के संबंध में बहुत बड़ी कठिनाइयाँ थीं। कोई जगह या व्यक्ति नहीं था जहां से मैं अपना भोजन प्राप्त कर सकूं। मैं सुबह-शाम ‘भज’ खरीदता था, गाँव के बाहर किसी एकान्त स्थान पर उन्हें खाता था और रात को ममलतदार के दफ़्तर के बरामदे में आकर सोता था। इस तरह, मुझे चार दिन बीत गए। यह सब मेरे लिए असहनीय हो गया। फिर मैं अपने पैतृक गाँव जेंतरल में रहने चला गया। यह बोरसद से छह मील की दूरी पर था। हर दिन मुझे ग्यारह मील पैदल चलना पड़ता था। यह मैंने डेढ़ महीने तक किया।

इसके बाद ममलतदार ने मुझे काम सीखने के लिए एक तलाटी में भेजा। यह तलाटी तीन गाँवों जेंतराल, खापुर और सायजपुर के प्रभारी थे। जेंथ्रल उनका मुख्यालय था। मैं दो महीने के लिए इस तलाटी के साथ जेंटलल में था। उन्होंने मुझे कुछ भी नहीं सिखाया, और मैंने कभी भी गांव के कार्यालय में प्रवेश नहीं किया। गाँव का मुखिया विशेष रूप से शत्रुतापूर्ण था। एक बार उन्होंने कहा था, “आपके फॉलोवर्स, आपके पिता, आपका भाई स्वीपर हैं, जो गाँव के ऑफिस में झाडू लगाते हैं, और आप ऑफिस में हमारे बराबर बैठना चाहते हैं! ध्यान रखना, बेहतर है कि आप इस नौकरी को छोड़ दें।”
एक दिन तलाटी ने मुझे गांव की जनसंख्या तालिका तैयार करने के लिए सैजपुर बुलाया। जेंतराल से मैं सैजपुर गया। मुझे गाँव के दफ्तर में हेडमैन और तलाटी कुछ काम करते हुए मिले। मैं गया, कार्यालय के दरवाजे के पास खड़ा था, और उन्हें “सुप्रभात,” की कामना की, लेकिन उन्होंने मेरी कोई सुध नहीं ली। मैं करीब पंद्रह मिनट तक बाहर खड़ा रहा। मैं पहले ही जीवन से थक गया था, और इस तरह से अनदेखा किया गया और अपमानित महसूस किया। मैं वहीं पड़ी एक कुर्सी पर बैठ गया। मुझे कुर्सी पर बैठा देखकर हैडमैन और तलाती चुपचाप मुझसे बिना कुछ कहे चले गए।

थोड़ी देर बाद, लोगों ने आना शुरू कर दिया और जल्द ही एक बड़ी भीड़ ने मुझे घेर लिया। इस भीड़ का नेतृत्व गाँव के पुस्तकालय के लाइब्रेरियन ने किया था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि एक शिक्षित व्यक्ति को इस भीड़ का नेतृत्व क्यों करना चाहिए था। मुझे बाद में पता चला कि कुर्सी उनकी थी। उसने मुझे सबसे बुरे शब्दों में गाली देना शुरू कर दिया। रावणिया (ग्राम सेवक) को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “भंगी के इस गंदे कुत्ते को कुर्सी पर बैठने की अनुमति किसने दी?” रावण ने मुझे उकसाया और मुझसे कुर्सी छीन ली। मैं जमीन पर बैठ गया।

जिससे भीड़ गांव के कार्यालय में घुस गई और मुझे घेर लिया। यह गुस्से से भड़की भीड़ थी, कुछ मुझे गाली दे रहे थे, कुछ मुझे धारी (तलवार जैसा धारदार हथियार) से काटने की धमकी दे रहे थे। मैंने उन्हें बहाना बनाया और मुझ पर दया करने के लिए। जिसका भीड़ पर कोई असर नहीं हुआ। मुझे नहीं पता था कि मैं खुद को कैसे बचा सकती हूं। लेकिन ममलतदार को मेरे भाग्य के बारे में लिखने का एक विचार आया, जो मुझे भा गया था, और मुझे यह बताने के लिए कि भीड़ द्वारा मारे जाने की स्थिति में मेरे शरीर का निपटान कैसे किया जाए। संयोग से, यह मेरी आशा थी कि अगर भीड़ को पता चला कि मैं व्यावहारिक रूप से उनके खिलाफ ममलतदार को रिपोर्ट कर रहा हूं, तो वे अपना हाथ पकड़ सकते हैं। मैंने रावण को मुझसे एक कागज देने को कहा, जो उसने किया।

डॉ. भीम राव अम्बेडकर का कथन है-

“शिक्षा जितनी पुरूषों के लिए आवशयक है उतनी ही महिलाओं के लिए।” ~ डॉ. भीम राव अम्बेडकर

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