मॉब लिंचिंग- भीड़ हत्या, मानवीय अपराध

समान्यतः मानव समाज में जीवन निर्वाह करता है, जो उसे आपत्ति-विपत्ति में साथ देता है, और हर्ष व उल्लास भी देता है। यही मानवीय समाज की प्रवृत्ति व व्यवहार है। हम अकसर किसी उत्सव को मानाने के लिए समूह में एकत्रित होते है, साथ ही किसी विकट परिस्थिति में भी हम एक साथ आते है। परिस्थिति वहीं इसके विपरीत, वही समूह कई बार बेहद डरावनी हो जाती है। यह भीड़ एक अमानवीय तस्वीर पेस करने के लिए तत्पर हो जाते है। ऐसी ही कुछ घटना को आपके समक्ष प्रस्तुत करते हैं।

अभी लॉकडाउन के दौरान, महाराष्ट्र के पालघर जिला के कासा पुलिस थाने के गॉव गढ़चिंचले में,  दिनांक 16 अप्रैल 2020  को रात के 9.30 से 10 बजे के बीच दो निहत्थे साधु और एक ड्राइवर की पीट-पीट कर निर्मम हत्या कर दी गई। ग्रामीणों ने इन तीनों लोगों की मॉब लिंचिंग उस समय की,  जब ये लोग मुंबई से सूरत अपने गुरू के अंतिम संस्कार में जा रहे थे। लॉकडाउन के चलते पुलिस ने इन्हें हाईवे पर जाने से रोक दिया, तो ग्रामीण इलाके की तरफ मुड़ गए, जहां मॉब लिंचिंग के शिकार हो गए। मृतकों की पहचान चिकणे महाराज कल्पवृक्ष गिरी, सुशीलगिरी महाराज और , नीलेश तेलगड़े के रूप में हुई है।

इसे अब विस्तार से जानिये

दरअसल, क्षेत्र में कुछ दिनों पहले से रात में फसल काटने एवं बच्चा चुराने वाला गिरोह सक्रिय होने की अफवाह फैली हुई थी। इसी बीच 16 अप्रैल 2020 को गांव के निगरानी दल ने दो साधु और एक ड्राइवर (महाराज सुशीलगिरीनीलेश तेलगड़े और जयेश तेलगड़े) को देर रात गांव से संदिग्ध रूप से कार से गुजरते हुए पकड़ा था। शक के आधार पर बच्चा चुराने वाला गिरोह समझ कर पत्थर और डंडों से इन पर हमला कर दिया। जिसमे वह लोग अत्यंत गंभीर रूप से घायल हो चुके थे। ग्रमीणों के बच्चा चोर संदिग्ध पर आक्रोश से पुलिस जवान भी भयभीत हो कर मुख दर्शक रहे, आक्रोश कम होने पर पुलिस ने उन्हें भीड़ से छुड़ाया और कासा गवर्मेंट हॉस्पिटल ले गए,  जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। यह अत्यंत अमानवीय घटना है। इस घटना की निंदा पुरे भारत में किया गया, साथ ही कठोर सजा की मांग किया गया है।

पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए अज्ञात लोगों के खिलाफ धारा 302,  आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 और महामारी रोग अधिनियम 1897 के तहत मामला दर्ज किया गया है। 110 लोगों के खिलाफ़ एफआईआर दर्ज की है, जिनमें से 101 को 30 अप्रैल तक पुलिस हिरासत में भेज दिया गया है, और नौ नाबालिगों को एक किशोर आश्रय गृह में भेज दिया गया है।

मानव अधिकार आयोग की मांग

गौरतलब है की मानव अधिकार आयोग ने भी महाराष्ट्र के डीजीपी को पालघर के मोब लिंचिंग की पर घटना के सिलसिले में नोटिस भेजा है। एनएचआरसी ने नोटिस का जवाब देने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। इस पर देशमुख ने ट्वीट किया, ” सूरत जा रहे तीन लोगों की पालघर में हुई हत्या में संलिप्त 101 लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया है। हत्या के मामले में मैंने उच्च स्तरीय जांच का आदेश दिया है।” देशमुख ने कहा कि पुलिस ऐसे लोगों पर करीबी नजर रख रही है, जो इस घटना के जरिए समाज में वैमनस्य पैदा करना चाहते हैं।

मॉब लिंचिंग- क्या और कब से

मोब लिंचिंग एक भीड़ या झुण्ड के द्वारा जबरन दिया गया सजा या हत्या है। जो की सबसे घिनौना जुर्म है, इसकी उत्पत्ति 18वीं शताब्दी में अमेरिकी क्रांति के दौरान चार्ल्स लिंच और कैप्टन विल्लियम लिंच से हुई, (पुस्तक Lynch-Law: An Investigation Into the History of Lynching in the United States) के अनुशार, चार्ल्स लिंच निजी अदालतें बिठाने लगा और अपराधियों तथा विरोधी को बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के सजा देने लगा। धीरे-धीरे लिंचिंग’ के रूप में यह शब्द पूरे अमेरिका में फैल गया, इस अत्याचार का सर्वाधिक शिकार अमेरिका के दक्षिणी हिस्से में बसे अश्वेत अमेरिकी समुदाय के लोग हुए। परन्तु  बाद में मैक्सिकन,  इतालवी और स्वयं श्वेत अमेरिकी भी इसके शिकार हुए।

भारत में मॉब लिंचिंग

भारत में भी मॉब लिंचिंग घटना कोई नया नहीं है, यहाँ शुरुआती दौर से दलितों और मुसलमानो पर मोब लिंचिंग जैसी घटनाये होती रही है। अंतरजातीय विवाह, जातिगत हिंसा, महिलाओ पर डायन के आरोप में या समाजिक – धार्मिक रूढ़िवादी परम्परा को बचाने के नाम पर मॉब लिंचिंग के कई रूप अस्तित्व में रहा, और इसका सबसे बड़ा उदाहरण खाप पंचायत का निर्णय रहा है।

मॉब लिंचिंग भी एक तरह की साम्प्रदायिक हिंसा है, और यह सबसे ज्यादा अमानवीय है। लिंचिंग के रूप में साम्प्रदायिकता का राक्षश और शक्तिशाली हुआ है। इस अमानवीय और क्रूर अपराध के सन्दर्भ में उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देश को नजरअंदाज करने के कारण ही इस तरह की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। लिंचिंग का उपयोग मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों का दमन करने लिए किया जा रहा था। परन्तु अब यह प्रत्येक जाती-धर्म के लिए अभिशाप सिद्ध हो गया। मॉब लिंचिंग न केवल उसके पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए एक दर्दनाक अनुभव है,  बल्कि इस तरह की घटनाएं देश की अंतरात्मा को झकझोरने वाली हैं।

समय समय पर ऐसी घटनाओ की  निंदा भी  किया गया, और सरकार से ऐसी अपराधों के विरुद्ध कठोर कदम के लिए माँग भी उठी है। परन्तु समय के पन्नो में ऐसी निवेदन खोती हुई भी दिखाई पड़ी है। पिछले 5 सालों में(2014  से 2019) मॉब लिंचिंग के 134 मामले में सबसे ज्यादा हिंसा की घटनाएं अनुसूचित जाति, मुसलमानों और पिछड़ों के साथ हुई हैं। 2019 से लेकर अब तक 11 ऐसी घटनाएं और 4 हत्याएं हो चुकी हैं, और ये सारे अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यक थे।’ (amarujala.com) और एक वेबसाइट के मुताबिक (aajtak.intoday.in)जिसमे कुल मिलाकर गोरक्षा के नाम पर अब तक कुल 85 गुंडागर्दी के मामले सामने आ चुके हैं। जिनमें 34 लोग मरे गए, और 289 लोगों को अधमरा कर दिया गया।

मॉब लिंचिंग की निंदा और न्याय की मांग

साल 2015 में अभिनेता  आमिर खान द्वारा असहिष्णुता  पर ब्यान सामने आया जिसमें आमिर खान की खूब निंदा किया गया। यहाँ तक की उन्हें देश छोड़ कर जाने की सलाह-मशवरा भी दिया जाने लगा। उसके बाद मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं के बीच कला, चिकित्सा, शिक्षा जगत की 49 हस्तियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा, पत्र में देश में भीड़ द्वारा लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है। (aajtak.intoday.in)

समाजिक कार्यकर्त्ता तुषार गांघी और तहसीन पूनावाला की याचिका पर, सुप्रीम कोर्ट ने घटनाओं में शामिल लोगों से सख्ती से निपटने के लिए विशेष कानून बनाने का भी निर्देश दिया। राज्यों द्वारा अफवाह फ़ैलाने पर रोकथाम के लिए जरुरी कदम उठाये भीड़ द्वारा हिंसा करने वालो पर तुरंत FIR दर्ज हो, समाज में नफरत फ़ैलाने वालो पर धरा 153 के तहत कार्यवाही हो। हर जिले में एसपी रैंक के अधिकारी को ऐसे मामलों की रोकथाम के लिए नोडल ऑफिसर बनाने का निर्देश दिया है, नोडल अधिकारी जांच की निगरानी करेंगे, केंद्र और राज्य सरकारें सोशल मीडिया और अन्य तरीकों से अफवाह या फेक न्यूज़ फैलाने पर रोकथाम के लिए जरूरी कदम उठाएंगे। ऐसे लोगों पर आईपीसी की धारा 153 के तहत मामला दर्ज करने का निर्देश दिया है ।

भारत में मोब लिंचिंग

भारत में भी मोब लिंचिंग घटना कोई नया नहीं है, यहाँ शुरुआती दौर से दलितों और मुसलमानो पर मोब लिंचिंग जैसी घटनाये होती रही है। अंतरजातीय विवाह, जातिगत हिंसा, महिलाओ पर डायन के आरोप में या समाजिक – धार्मिक रूढ़िवादी परम्परा को बचाने के नाम पर लिंचिंग के कई रूप अस्तित्व में रहा, और इसका सबसे बड़ा उदाहरण खाप पंचायत का निर्णय रहा है।

 लिंचिंग भी एक तरह की साम्प्रदायिक हिंसा है, और यह सबसे ज्यादा अमानवीय है। लिंचिंग के रूप में साम्प्रदायिकता का राक्षश और शक्तिशाली हुआ है। इस अमानवीय और क्रूर अपराध के सन्दर्भ में उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देश को नजरअंदाज करने के कारण ही इस तरह की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। लिंचिंग का उपयोग मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों का दमन करने लिए किया जा रहा था। परन्तु अब यह प्रत्येक जाती-धर्म के लिए अभिशाप सिद्ध हो गया। मॉब लिंचिंग न केवल उसके पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए एक दर्दनाक अनुभव है,  बल्कि इस तरह की घटनाएं देश की अंतरात्मा को झकझोरने वाली हैं।

समय समय पर ऐसी घटनाओ की  निंदा भी  किया गया, और सरकार से ऐसी अपराधों के विरुद्ध कठोर कदम के लिए माँग भी उठी है। परन्तु समय के पन्नो में ऐसी निवेदन खोती हुई भी दिखाई पड़ी है। पिछले 5 सालों में(2014  से 2019) मॉब लिंचिंग के 134 मामले में सबसे ज्यादा हिंसा की घटनाएं अनुसूचित जाति, मुसलमानों और पिछड़ों के साथ हुई हैं। 2019 से लेकर अब तक 11 ऐसी घटनाएं और 4 हत्याएं हो चुकी हैं, और ये सारे अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यक थे।’ (amarujala.com) और एक वेबसाइट के मुताबिक (aajtak.intoday.in) जिसमे कुल मिलाकर गोरक्षा के नाम पर अब तक कुल 85 गुंडागर्दी के मामले सामने आ चुके हैं। जिनमें 34 लोग मरे गए, और 289 लोगों को अधमरा कर दिया गया।

सामाजिक सौहार्द पर मॉब लिंचिंग का प्रभाव

हमारी संस्कृति विभिन्ताओ में एकता का मिशाल रहा है, बहू भाषी, बहू धर्मी, और बहू सांस्कृतिक है, संविधान ने हर नागरिक को विचार, विश्वाश और धर्म की उपासना और अभिव्यक्ति की आजादी देती है। यदि हर जगह अराजकता और हिंसा का माहौल पैदा हो जाये, तो हमारी संस्कृति का क्या होगा। जाहिर है ऐसे में समाजिक रिश्ते टूट कर बिखर जायेंगे, और तनाव का माहौल पैदा हो जायेगा।

ऐसे में देखा जा सकता है की, किसी मनुष्य को पिट पिट कर हत्या कर देना सिर्फ मानव हत्या का मामला नहीं है। बल्कि हमारी संस्कृति, समाजिक एकता की भी हत्या है। अर्थात शिक्षा, विकाश और समाजिक समरसता जैसे पहलुओ का पतन है।

मॉब लॉन्चिंग अमानवीय और क्रूर अपराध के लिए कठोर कदम उठाना चाहिए। घृणा फ़ैलाने वाली वाली घटनाओ पर चुप्पी तोड़ने की जरुरत है। 

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