भारत की युवा जनता और वैचारिक नपुंसकता

उस रोटी का भी क्या जिसे तुम्हारे लास पर सेका जाये। समाज को धर्म के आधार पर बाटा जा रहा है और इसमे सभी धर्म अपना-अपना योगदान रहे है। कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता है। लेकिन जो बेमौत मर रहे है या आगे मरने वाले है वो सिर्फ हम जैसे आम इन्सान ही है। -TNT | The Negative Thinker

TNT | The Negative Thinker

मेरा मानना है की देश के युवाओ में नैतिक नपुंसकता आ चुकी है। जिसके वजह से वो नेताओ से सवाल करना छोड़ दिए है। और नेताओ के बदले का जबाब खुद दे रहे है। वो भी गाली के जरिये या फिर किसी स्लोगन के जरिये। इन्हें ये नहीं मालूम की ये कर क्या रहे है। ये खुद के लिए कांटा बो रहे हैं और उसे सींच भी रहे है। करण बस इतना है की इन्हें कुछ नेताओ ने कह दिया है की इनके पडोसी ने घर में सूल बो रक्खे है। 

हम ये भूलने लगे है की हम जो बोतें है वही काटना भी पड़ता है। हम जो बो रहे है वो हम भी काटेंगे और हमारे आपने आने वाली पीढ़ी भी कटेगी। तब हमारे पास कोई चारा नहीं होगा। सामाजिक दहसत को बढ़ावा दे के जो हासिल होगा, उससे किसी की राजनीतिक रोटी तो सिक सकती है, पर याद रखिये उसमे जलने वाला कोई और नहीं होगा, हमारे सिवा।  

उस रोटी का भी क्या जिसे तुम्हारे लास पर सेका जाये। समाज को धर्म के आधार पर बाटा जा रहा है और इसमे सभी धर्म अपना-अपना योगदान रहे है। कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता है। लेकिन जो बेमौत मर रहे है या आगे मरने वाले है वो सिर्फ हम जैसे आम इन्सान ही है। 

इतिहास गवाह है आज तक जब भी समाज में दंगे हुआ, उसमे किसका लुकसान हुआ और किसका लाभ हुआ। इतिहास इस बात का भी प्रमाण देता है की जनता जब भी मुकदर्शी हुई है। शिकार हुई है।

खैर आप का क्या है, आप तो वही कह रहे है जो आप के नेताओ ने कहा है। आप वही सही मान रहे है जो आप को नेताजी ने कहा है। आप का आँख, आप का मुह, आप का कान और अब तो वो आप के दिमाग पर भी राज कर रहे है। 

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